Friday, May 05, 2017

काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

कोई दुनिया में न तक़्दीर का मारा होता
हर किसी को जो मुहब्बत का सहारा होता

मैं तेरे नाम की माला न जपा करता यूँ
यार तू मुझको ख़ुदा से जो न प्यारा होता

मान लेता भी के है तुझको मुहब्बत मुझसे
तीर ही नज़रों का सीने में उतारा होता

बाबते इश्क़ मेरी शोख़ तमन्नाओं पर
थे चले संग चला काश के आरा होता

मेरी आवारगी इस तर्ह न बढ़ जाती अगर
तू भले गुल से ही पर खेंच के मारा होता

थोड़ा सा अश्क जो लोगों पे लुटा देता तो
बात पक्की है समंदर न यूँ ख़ारा होता

तू पुकारा तो ज़माने को मगर क्या हासिल
काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, May 02, 2017

गो निहारी न गई राह मेरी

कैसे कह दूँ के है तनख़्वाह मेरी
आप कहते हैं जिसे आह मेरी

आपके दर पे चला आया हूँ मैं
गो निहारी न गयी राह मेरी

वक़्त मेरा है वहीं गुज़रा जहाँ
एक को भी थी नहीं चाह मेरी

लीजिए पढ़ तो दिया शे’र तमाम
अब तो लौटाइए जी वाह मेरी

थी तो ग़ाफ़िल ही मगर क्या थी ग़ज़ब
हाँ जवानी वो शहंशाह मेरी

-‘ग़ाफ़िल’