कोई दुनिया में न तक़्दीर का मारा होता
हर किसी को जो मुहब्बत का सहारा होता
मैं तेरे नाम की माला न जपा करता यूँ
यार तू मुझको ख़ुदा से जो न प्यारा होता
मान लेता भी के है तुझको मुहब्बत मुझसे
तीर ही नज़रों का सीने में उतारा होता
बाबते इश्क़ मेरी शोख़ तमन्नाओं पर
थे चले संग चला काश के आरा होता
मेरी आवारगी इस तर्ह न बढ़ जाती अगर
तू भले गुल से ही पर खेंच के मारा होता
थोड़ा सा अश्क जो लोगों पे लुटा देता तो
बात पक्की है समंदर न यूँ ख़ारा होता
तू पुकारा तो ज़माने को मगर क्या हासिल
काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता
-‘ग़ाफ़िल’
हर किसी को जो मुहब्बत का सहारा होता
मैं तेरे नाम की माला न जपा करता यूँ
यार तू मुझको ख़ुदा से जो न प्यारा होता
मान लेता भी के है तुझको मुहब्बत मुझसे
तीर ही नज़रों का सीने में उतारा होता
बाबते इश्क़ मेरी शोख़ तमन्नाओं पर
थे चले संग चला काश के आरा होता
मेरी आवारगी इस तर्ह न बढ़ जाती अगर
तू भले गुल से ही पर खेंच के मारा होता
थोड़ा सा अश्क जो लोगों पे लुटा देता तो
बात पक्की है समंदर न यूँ ख़ारा होता
तू पुकारा तो ज़माने को मगर क्या हासिल
काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता
-‘ग़ाफ़िल’