Sunday, December 25, 2011

कस्म गोया तेरी खायी न गयी

दिल से तस्वीर मिटायी न गयी
याद तेरी थी भुलायी न गयी

ग़ुफ़्तग़ू होती मज़ेदार मगर
बात बाक़द्र चलायी न गयी

खोजता आज भी रहता हूँ जिसे
वह ख़ुशी हमसे तो पायी न गयी

खा लिया मैंने क़फ़स की भी हवा
क़स्म गोया तेरी खायी न गयी

बढ़के पल्लू को पकड़ लेने की
रस्म ग़ाफ़िल से निभायी न गयी

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, November 08, 2011

चिकनी राह बुलाए गाफिल!

मन का घोड़ा बाँध रखा था छोड़ा नहीं मचलने को
पानी सर से ऊपर है अब मौका नहीं सँभलने को

चाँद रहा है मिसाल हरदम रुखे-माहपारावों का
हम हैं के आमादा उसको पावों तले कुचलने को

आता भी है जाता भी है दुनिया का हर एक बसर
भरम है तेरा लगा हुआ जो यह दस्तूर बदलने को

यह तो तेरी रह का एक पड़ाव है यार! नहीं मंजिल
हुआ बहुत आराम हो अब तैयार भी आगे चलने को

चलता रहता हूँ चलना ही फ़ित्रत है अपनी गोया
चिकनी राह बुलाए ग़ाफ़िल अपनी सिम्त फिसलने को

-‘ग़ाफ़िल’