Friday, October 12, 2012

रात का सूनापन अपना था

रात का सूनापन अपना था।
फिर जो आया वह सपना था॥

नियति स्वर्ण की थी ऐसी के
उसको भट्ठी में तपना था।

दौरे-तरक्क़ी इंसाँ काँपे
जबकी हैवाँ को कँपना था।

गरदन तो बेजा नप बैठी
दुष्ट दस्त को ही नपना था।

ग़ाफ़िल त्राहिमाम चिल्लाया
गोया राम-नाम जपना था।

आप फ़ेसबुक आई.डी. से भी कमेंट कर सकते हैं-

Sunday, September 30, 2012

आईने पर कुछ तरस तो खाइए!

आइए तो इत्तिलाकर आइए!
जाइए तो बिन बताए जाइए!

दिल मेरा है साफ़ मिस्ले-आईना,
अपने चेहरे को तो धोकर आइए!

पाइए! जी पाइए! बेहद सुकूँ,
चश्म ख़म करके ज़रा मुस्काइए!

मोड़िए यूँ भी नहीं झटके से रुख़
आईने पर कुछ तरस तो खाइए!

हुस्न है बा-लुत्फ़ जो पर्दे में हो,
आईने से भी कभी शर्माइए!

छोड़िए! 'ग़ाफ़िल' को उसके नाम पर,
आप तो ग़ाफ़िल नहीं हो जाइए!

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.