Tuesday, February 28, 2017

दर्द इस तर्ह कुछ तो कम होंगे

आशिक़ों के जो निकले दम होंगे
हुस्न के यूँ भी क्या सितम होंगे

यूँ बढ़ाओगे बात जीतनी ही
बात में उतने पेचो ख़म होंगे

हो चुके बिछते बिछते संगे राह
चश्म ये अब न यार नम होंगे

ख़्वाहिशों कर दिया है तुमको तर्क़
दर्द इस तर्ह कुछ तो कम होंगे

ख़त्म होंगे न अश्क ग़ाफ़िल गर
हाले ख़स्तः भी ख़ाक ग़म होंगे

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, February 27, 2017

तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

ढूँढा करता हूँ जहाँ तेरा निशाँ होता है
अब बता तू ही के तू यार कहाँ होता है

तेरे पीछे मैं चला जाता हूँ सहरा सहरा
शब को भी गर तू ख़यालों में अयाँ होता है

गो है तूने ही दिया पर हो तुझे क्यूँ एहसास
हाँ वही दर्द मुझे जितना जहाँ होता है

आह भरते हैं कई नाम तेरा ले लेकर
यह तमाशा भी सरे शाम यहाँ होता है

ख़ुश्बू तेरी सी ही आती है जहाँ से ग़ाफ़िल
तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

-‘ग़ाफ़िल’