Wednesday, February 26, 2020

चलूँ कहाँ से मेरा रास्ता कहाँ निकले

न यूँ हुआ है के घर हर कोई मक़ाँ निकले
के गर हो आग यक़ीनन वहाँ धुआँ निकले

तभी कहूँगा के आया है लुत्फ़ मुझको भी गर
ज़मीन खोदूँ मैं और उससे आसमाँ निकले

किसी भी दौर में कोई कहीं भी कैसी भी
पढ़े किताब तेरी मेरी दास्ताँ निकले

कुछ ऐसी बात है मुझमें के है नसीब मेरा
पहुँच गया तो बियाबाँ भी गुलसिताँ निकले

न इल्म होगा ख़ुदा को भी यह के मैं ग़ाफ़िल
चलूँ कहाँ से मेरा रास्ता कहाँ निकले

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, February 20, 2020

ग़ाफ़िल अपनी डाल पे ही पर चलाना सीख ले

ख़ुश है रहना गर तरीक़ा हर पुराना सीख ले
या कोई सूरत निकाल और आज़माना सीख ले

गा न वह जो ठीक है ग़ाफ़िल नहीं अब यह चलन
जो सभी को भाए वो ही गीत गाना सीख ले

मंज़िल उल्टी सीधी हो ग़ाफ़िल ही हो गर हमसफ़र
फिर तू उल्टी सीधी रह पर आना जाना सीख ले

बात नखरों से भी बन जाती है ग़ाफ़िल आजकल
ऐसे जैसे तैसे नखरा ही दिखाना सीख ले

धूल के इस आसमाँ में भर नहीं सकता उड़ान
ग़ाफ़िल अपनी डाल पे ही पर चलाना सीख ले

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)