Friday, June 04, 2021

ख़्वाबों में क्यूँ न आज से अक़्सर मिला करें (221 2121 1221 212)

हमको क़ुबूल है के कहा आपका करें
पर चाहिए के आप भी कुछ इस तरह करें

कर तो चुके हैं ख़ुद को हवाले हम आपके
कहिए हुज़ूर आप के हम और क्या करें

रुस्वाइयों से चाहिए हमको नहीं निजात
इतना मगर हो आप ही बाइस हुआ करें

ये हुस्नो इश्क़ के हैं अजीबोग़रीब पेंच
ऐसा है चलिए काम कोई दूसरा करें

ग़ाफ़िल इस अपने वस्ल से दुनिया को रंज़ है
ख़्वाबों में क्यूँ न आज से अक़्सर मिला करें

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, April 20, 2021

पर ये ग़फ़लत मेरी हक़ीक़त है (2122 1212 22)

फ़िक़्रा ये क्या के शानो शौकत है
ये भी इक रंग है ज़ुरूरत है

लोग कहते हैं लत बुरी है यह
पर ये ग़फ़लत मेरी हक़ीक़त है

वर्ना कह देता, हूँ अभी मश्गूल
आप आए हो मुझको फ़ुर्सत है

है नज़ारों में वैसे क्या क्या पर
मेरी नज़रों को आपकी लत है

बिक तो सकता है कोई भी इंसान
इक तबस्सुम ही उसकी क़ीमत है

वो जो दर्या बहा रहा आँसू
शायद उसको मेरी ज़ुरूरत है

हुस्न आदत है इश्क़ की यानी
हुस्न यार इश्क़ की बदौलत है

हो चुकी है ग़ज़ल पर इसमें फ़क़त
एक ग़ाफ़िल और उसकी ग़फ़लत है

-‘ग़ाफ़िल’