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शनिवार, जुलाई 23, 2011

नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी

तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।
पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।

'हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।

तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

है इशरते-सुह्बत-ए-हुस्न किस्मतन अता,
'ग़ाफ़िल' भी क्यूँ न मौज मनाये कभी-कभी॥

(रक़ीब=एक ही प्रेमिका के दो प्रेमी आपस में रक़ीब कहलाते हैं, ज़िश्तरू=बदसूरत, इशरत=खुशी)  
                                                                 -ग़ाफ़िल

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत गज़ल ... आज सच ही नफरत भी ढंग से नहीं निभायी जाती :):)

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  2. fir se ek badhiya ghazal.Gafil ji aap itne achchi urdu kaise likh lete hain?

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  3. तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।
    पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

    बहुत खूब ! बेहतरीन गज़ल..

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  4. तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
    तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

    रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
    नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

    वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ...अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  5. एक बार फिर से बेहतरीन ग़ज़ल ....बहुत खूब

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  6. रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
    नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

    - बेहतरीन ग़ज़ल.बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  7. तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
    तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

    बेहतरीन अशआर,बेहतरीन गज़ल,वाह !!!

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  8. मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
    मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।
    बहुत ख़ूब!

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  9. तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,


    behtareen gagal , thank u

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  10. बहुत खूबसूरत और भावप्रणव ग़ज़ल लिखी आपने "ग़ाफिल" साहब!
    ग़ज़लों में आपका कोई सानी नहीं हैं!

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  11. रचना के बिम्ब बहुत रोचक है शब्द संयोजन बहुत कमाल का खुबसूरत ग़ज़ल

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  12. तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
    तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।...waah

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  13. बहुत सुन्दर शब्द संयोजन , बहुत सुन्दर रचना

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  14. बहुत ही सुंदर शब्दों का सर्जन... सुंदर ग़ज़ल...

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  15. Umda gajal..vah...vah...koi nafarat to dhab se nibhaye..kya khub kaha hai..

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  16. 'हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
    दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।

    खूबसूरत गजल...आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  17. हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
    दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।
    bahut khoob
    behtreen gazal

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  18. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग इस ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो हमारा भी प्रयास सफल होगा!

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