फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

सोमवार, जुलाई 25, 2011

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता।
ग़रचे इक शोख नज़र का ग़जब नहीं होता॥

जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?

मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।

हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥
                                                 -ग़ाफ़िल

23 टिप्‍पणियां:

  1. जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
    फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?

    बहुत खूब ...खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  2. हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
    दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

    बहुत सुन्दर रचना ,सार्थक विषय

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय ग़ाफ़िल जी
    नमस्कार !
    ......बहुत उम्दा रचना है सर,
    दिल की गहराईयों को छूने वाली बेहद खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
    फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?
    ...वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मुअज्जज ग़ालिब ने कहा ".... चाहिए एक उम्र असर होने तक..." वह तब की बात थी...आप ने आज का सत्य कहा है...
    आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
    उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

    असरदार ग़ज़ल सर...
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
    उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।
    बेहतरीन ग़ज़ल।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
    फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?
    मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
    अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।


    खूबसूरत ग़ज़ल....

    उत्तर देंहटाएं
  8. हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
    दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

    बहुत सुन्दर ||
    बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  9. क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
    कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥

    pahli baar pda aapko...

    aapka blog jabardat hai...
    aage bhi padna chahunga...
    join kar raha hun....

    mere blog par bhi aapka swaagat hai...

    उत्तर देंहटाएं
  10. जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
    फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?
    shaandar.

    उत्तर देंहटाएं
  11. गज़ब की गज़ल है आखिरी शेर तो लाजवाब है।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आप सभी शुभचिंतकों का बहुत-बहुत आभार

    उत्तर देंहटाएं
  13. आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे
    उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता '
    .............वाह ! अति सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत ही बेहतरीन और उम्दा गजल

    उत्तर देंहटाएं
  15. आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
    उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

    वाह !!!!!!!!!!!!फिदा हो गए हम तो.........

    उत्तर देंहटाएं
  16. आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
    उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

    वाह !!!!!!!!!!!!फिदा हो गए हम तो.........

    उत्तर देंहटाएं