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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, July 30, 2011

और ये पूछते हो के क्या देखते हो

जो हुस्नो-हरम में अज़ा देखते हो।
अरे शेख़ जन्नत कहाँ देखते हो?

निगाहों में तेरी भरम का ये आलम!
हमारी वफ़ा भी जफ़ा देखते हो।

जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

अभी चश्मे-ग़ाफ़िल खुले भी नहीं हैं,
और ये पूछते हो के क्या देखते हो।

(अज़ा=दुःख, ज़फ़ा=बेवफ़ाई, तख़्लिया=एकान्त, रश्क=प्रतिस्पर्द्धा का भाव, जहन्नुम=नर्क, मर्तबा=प्रतिष्ठा, रुत्बा)

                                                                       -'ग़ाफ़िल'

24 comments:

  1. आप मिश्र जी बहुत ही अच्छी ग़ज़लें कहते है बस आपसे एक विनम्र अनुरोध है कि आप हिंदी में ग़ज़लें कहें उर्दू के जो शब्द हमारे जीवन में रचे बसे हैं उन्हीं का प्रयोग करें |ब्लाग पर आने के लिए आशीर्वाद देने के लिए आभार |

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  2. भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।
    बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। नीचे उर्दू के शब्दों के मानी दे देने से कई नए शब्द भी सीखने को मिलते हैं।

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  3. जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
    भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

    बेहतरीन| और मर्तबा वाला भी अलग हट के टाइप है| बहुत बहुत बधाई|

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  4. बेहतरीन ग़ज़ल , आभार

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  5. निगाहों में तेरी भरम का ये आलम!
    हमारी वफ़ा भी जफ़ा देखते हो।

    बहुत खूब गाफ़िल जी .......

    बेहतरीन ग़ज़ल है....

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  6. बहुत ही सुन्दर

    बधाई ||

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  7. जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
    भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

    वाह ..क्या बात है ..खूबसूरत गज़ल

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  8. भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।... bahut badhiyaa

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  9. बहुत सुन्दर्॥


    आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  10. जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
    भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

    भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

    waha bahut khub...bahut hi khub...........aabhar

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  11. भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

    खूबसूरत गजल.आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  12. जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
    भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

    बेहतरीन अभिव्यक्ति..... सभी पंक्तियाँ प्रभावी बन पड़ी हैं...

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  13. अभी चश्मे-ग़ाफ़िल खुले भी नहीं हैं,
    और ये पूछते हो के क्या देखते हो।

    बेहतरीन शेर....बेहतरीन ग़ज़ल ....

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  14. वाह!
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आपने!
    --
    पूरे 36 घंटे बाद नेट पर आया हूँ!
    धीरे-धीरे सबके यहाँ पहुँचने की कोशिश कर रहा हूँ!

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  15. भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही सर....
    सादर....

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  16. Bahut hi sundar Gazal hai.... Aabhaar!!

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  17. अभी चश्मे.ग़ाफ़िल खुले भी नहीं हैं,
    और ये पूछते हो के क्या देखते हो।

    चर्चामंच के माध्यम से एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली।

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  18. वाह --

    बहुत खूबसूरत प्रस्तुति--



    लीडर यह सचमुच निडर, मिटा प्रतिष्ठा मूल।

    फिरे जहन्नुम ढूंढता, फिर से खता क़ुबूल ।।


    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक

    dineshkidillagi.blogspot.com



    होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
    कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

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  19. उम्दा गजल !
    आभार !

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  20. भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
    जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

    बहुत खूब .शब्दार्थ देकर और भी कमाल करते हो .होली मुबारक .होली का हर रंग हर ढंग मुबारक ,गुलाल अबीर चांग मुबारक .

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