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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, July 25, 2011

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब


वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा।

गुल का हर शख़्स हमेशा ही तलबगार रहा,
शाखे- गुल का कोई महफूज ठिकाना न रहा।

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।

तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।

'आग इक थी लगी' यह बात याद करने को,
ज़िश्तरूई का मेरे कम तो बहाना न रहा।

ज़ीनते- चश्म वो मेरी है अब कहाँ ग़ाफ़िल?
चश्म के ज़ेरे- असर कोई दीवाना न रहा॥

(ज़िश्तरूई=बदसूरती, ज़ीनते-चश्म=आँखों की रौनक, जेरे-असर=प्रभाव में)
                                                                        -ग़ाफ़िल

29 comments:

  1. तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
    वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।

    waha bahut khub.......

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  2. आदरणीय ग़ाफ़िल जी
    नमस्कार !
    .....बेहतरीन गज़ल,

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  3. बहुत सुंदर, पहली ही लाइन से धार पर आ गई गजल

    वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
    साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा।

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  4. baat dil ki hai to phir dil se hi ki jayegee...ghazal jab shaandar to dil se hi dad di jayegi...har sher shandar..jaandar praastuti.badhai

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  5. वो तरन्नुम न रह और वो तराना न रहा
    साज़ ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा
    .................गज़ब का मुखड़ा
    .........हर शेर उम्दा ....बेहतरीन ग़ज़ल

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  6. तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
    वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।

    bahut khub sir.....

    behatreen ghazal.....

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  7. गुल का हर शख़्स हमेशा ही तलबगार रहा,
    शाखे- गुल का कोई महफूज ठिकाना न रहा।

    बहुत उम्दा ग़ज़ल।
    हर शेर लाजवाब।

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  8. थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
    अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  9. थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
    अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।


    बहुत उम्दा गज़ल!!!!

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  10. ज़ीनते- चश्म वो मेरी है अब कहाँ ग़ाफ़िल?
    चश्म के ज़ेरे- असर कोई दीवाना न रहा॥

    bahut sunder bhaav...

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  11. सुंदर ग़ज़ल....

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  12. हर शेर का अपना वजूद है, काफी है कमाल करने को , भूरी -२ प्रशंसा करते हैंआपकी रचना का /

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  13. थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
    अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।

    बधाई ||

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  14. बहुत खूबसूरत गज़ल ..हर अशआर खूबसरती से अपनी बात कहता हुआ

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  15. तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
    वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।
    बहुत उम्दा गज़ल है सर, सादर...

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  16. बहुत सुन्दर नज़्म्।

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  17. lagta hai aap urdu sikhake chorege !! jitni samajh me aayee utni to bahut achchi lagi.!!!

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  18. वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
    साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा

    खूबसूरत गजल...आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  19. गुल का हर शख़्स.............
    जिश्तरूई का मेरे.................

    बहुत खूब


    घनाक्षरी समापन पोस्ट - १० कवि, २३ भाषा-बोली, २५ छन्द

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  20. आदरणीय ग़ाफ़िल जी नमस्कार.....भावपूर्ण अभिव्यक्ति और सुन्दर प्रस्तुति........ बहुत बहुत बधाई...

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  21. बहुत भावपूर्ण रचना |बधाई |
    आशा

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  22. वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
    साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा।

    ग़ाफिल.... साज बजाता हूं.. अपने लिए.. और वो तो बजाता ही रहूंगा..

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