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रविवार, मार्च 23, 2014

एक मौक़ा तो हो तक़दीर आजमाने को

कोई जो देख ले इस रूप के ख़ज़ाने को
न क्यूँ मचल उठे वह शख़्स इसे पाने को
ये और बात है के इखि़्तयार हो के न हो
एक मौक़ा तो हो तक़दीर आजमाने को

-‘ग़ाफ़िल’

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (24-03-2014) को लेख़न की अलग अलग विधाएँ (चर्चामंच-1561) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शहीदों को नमन के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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