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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, May 29, 2014

धोई-धाई सी मक्कारी

ये दुनियाबी बातें लिखना
दिन को लिखना रातें लिखना
लिखना अरमानों की डोली
कैसे मुनिया मुनमुन हो ली
धन्धा-पानी ठंढी-गर्मी
चालाकी हँसती बेशर्मी
मिलन की रातें रोज़ जुदाई
दिल की दिल से हाथापाई
दिनभर ठगना और ठगाना
वादों का मुरझा सा जाना
ग़ाफ़िल है यह दुनियादारी
धोई-धाई सी मक्कारी

6 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.05.2014) को "समय का महत्व " (चर्चा अंक-1628)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. मक्कारी का लिबास साफ़-सुथरा ही दिखता है...

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  3. धोई धोई सी मक्कारी, वाह ।

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  4. एक एक शब्द मानो दिल में पसर गया हो..बहुत उम्दा...

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  5. मिलन की रातें रोज़ जुदाई
    दिल की दिल से हाथापाई
    दिनभर ठगना और ठगाना
    वादों का मुरझा सा जाना
    ग़ाफ़िल है यह दुनियादारी
    धोई-धाई सी मक्कारी
    क्या बात है !

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