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बुधवार, अक्तूबर 29, 2014

बड़ी मुश्क़िल से मिलती है

कभी गाहे बगाहे आदतन ग़ाफ़िल से मिलती है
मगर जब भी ये मिलती है हमेशा दिल से मिलती है
नींद गर ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाय समझो ख़ुद को क़िस्मतवर
ये दौलत इस ज़माने में बड़ी मुश्क़िल से मिलती है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 09, 2014

छुपा ख़ंजर नही देखा

बहुत दिन बाद आप क़द्रदानों की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ छोटी सी एक ताज़ा ग़ज़ल मुलाहिजा फ़रमाएं!

जो हर सर को झुका दे ख़ुद पे ऐसा दर नहीं देखा।
जो झुकने से रहा हो यूँ भी तो इक सर नहीं देखा।।

मज़ा मयख़ाने में उस रिन्द को आए तो क्यूँ आए,
जो साक़ी की नज़र में झूमता साग़र नहीं देखा।

पहुँच जाता कोई वाँ पे जहां ईसा का रुत्बा है,
कोई बिस्तर नहीं छोड़ा के वो बिस्तर नहीं देखा।

लुटेरा क्यूँ कहें उनको चलो यूँ जी को बहला लें
वो मुफ़लिस हैं कभी आँखों से मालोज़र नहीं देखा।

लुटा दिल का ख़जाना ही कोई दिलदार कहलाए,
लुटाकर देखना यारा अभी तक गर नहीं देखा।

क़यामत है के रुख़ भी और निगाहे-लुत्फ़ भी उनका,
मेरी जानिब ही है गोया जिसे अक्सर नहीं देखा।

हो चुका क़त्ल अब रोने से और धोने से क्या होगा,
चश्मे-मासूम में ग़ाफ़िल छुपा ख़ंजर नही देखा।।

-‘ग़ाफ़िल’

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