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सोमवार, जून 22, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया

1-
किया कुछ वक़्त ने मज़्बूर कुछ बंदिश ज़माने की,
हुई जाती है गश्तः उम्र यूँ अपने फ़साने की।
2-
हद से ज़्यादा बंदिशों के हम कभी क़ाइल नहीं,
आप आएं या न आएं ख़्वाब तो देखेंगे हम।
3-
नदी का ये उफान और टूटते जाना यूँ बन्धों का,
था अच्छा चश्म दो आपस में टकराए नहीं होते।
4-
सूख जाना ही तो था गुल का नसीब,
बाग़बाँ बदनाम बेमतलब हुआ।
5-
फिर मेरे क़त्ल की उम्मीद जगी है साहिब,
फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया।
6-
तु जो मिल जाय तो इस पर मेरी भी राय हो क़ायम,
के सपने सुब्ह के अक्सर हक़ीक़त में बदलते हैं।
7-
तू ज़रा साफ़ तो कर आईना-ए-दिल अपना,
मेरा क़िरदार चमकता सा नज़र आएगा फिर।
8-
वे ही संभाल पाए न इक बेवफ़ा लक़ब,
माला जपा किए जो सुबो शाम इश्क़ की।
9-
फिर सँपोले को आस्तीं में पनाह?
जबके मालूम है वो क्या देगा!
10.
मैं क्या हूँ यह न पूछ और तू क्या है न बता,
बस मेरी हर इक सांस में ख़ुश्बू तेरी रहे।

1 टिप्पणी:

  1. फिर मेरे क़त्ल की उम्मीद जगी है साहिब,
    फिर मेरे भूलने वालों ने याद फ़रमाया।

    क्या बात है वाह्ह्ह्ह्ह्ह

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