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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, June 28, 2015

उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता

कभी टूटा हुआ तारा सितारा हो नहीं सकता।
उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता।।

हमारे सिम्त अब आओगे तो हासिल न कुछ होगा,
हमारा चोट खाया दिल तुम्हारा हो नहीं सकता।

लगे रहते हैं रोज़ो-शब उगाते फ़स्ल ग़ज़लों की,
मगर अफ़सोस के इनसे गुज़ारा हो नहीं सकता।

ग़ज़ल में एक दो ही शे'र होते हैं सलीके के,
जो दिल को चूम ले वह ढेर सारा हो नहीं सकता।

चलें कू-ए-सुखन से दूर अब रोटी भी कुछ कर लें,
है सच के शेश्र जीने का सहारा हो नहीं सकता।

हमें सहरा में भी अब लुत्फ़ लेना आ गया ग़ाफ़िल,
चुनांचे ख़ुल्द भी हमको गवारा हो नहीं सकता।।

2 comments:

  1. ग़ज़ल में एक दो ही शेर होते हैं सलीके के,
    जो दिल को चूम ले वह ढेर सारा हो नहीं सकता।

    बहुत सुन्दर ... वाह्ह्ह्ह जनाब

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