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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, June 10, 2016

दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

जान लो क़त्ल हो गया अपना
नैन उससे अगर मिला अपना

तू ही था अपना पर है ग़ैर का अब
दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

मैक़दा है ये पास आजा अदू
साथ याँ कौन है दिया अपना

अब तलक आलमे बेहोशी है
मुस्कुराकर कोई कहा अपना

हार अपनी कहूँ के जीत कहूँ
जो है जीता वो ख़ास था अपना

शाने महफ़िल है क़स्म से ग़ाफ़िल
शे’र मारा हुआ तेरा अपना

(अदू=दुश्मन)

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (11-06-2016) को "जिन्दगी बहुत सुन्दर है" (चर्चा अंक-2370) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इस रूमानी अंदाज में इस अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर बधाई के साथ

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