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रविवार, जून 12, 2016

पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

लिख रहा हूँ मैं ग़ज़ल शामो सहर पर
मेरी है थोड़ी भी इज़्ज़त कौन जाने
वाह तो भरपूर मिल जाती है ग़ाफ़िल
पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

(कुछ लकीरें टेढ़ी मेढ़ी खेंच दी सफ्हा-ए-दिल पर
लोग देखे और बोले शा’इरी उम्दा हुई है)

-‘ग़ाफ़िल’

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