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शुक्रवार, जून 17, 2016

वाह री ज़िन्दगी

गोया है मिह्रबाँ आज भी ज़िन्दगी
पर कहाँ अब वो अपनी रही ज़िन्दगी

मैं था हैरान क्या हो रहा है यहाँ
और मुझसे रही खेलती ज़िन्दगी

मैं तवज़्ज़ो दिया उम्र भर बेश्तर
फिर रही क्यूँ कटी की कटी ज़िन्दगी

फ़ाइदा ग़ैर का और अपना ज़रर
तू किए जा रही वाह री ज़िन्दगी

अब तलक ख़ार चुभते चले आ रहे
फिर कहूँ क्यूँ के है रसभरी ज़िन्दगी

राह में थे हज़ारों मक़ाम उसके पर
एक की भी नहीं हो सकी ज़िन्दगी

आज गर है ख़िज़ाँ तो बहार आए कल
यह पता है तो क्या सोचती ज़िन्दगी

कह रहा हूँ के कर दे गिला दूर सब
क्या करेगी न फिर गर मिली ज़िन्दगी

जीतना था अजल को गई जीत पर
आख़िरी साँस तक है लड़ी ज़िन्दगी

सोचता ही रहा वक़्ते रुख़्सत मैं यह
एक ग़ाफ़िल की भी क्या रही ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (18-06-2016) को "वाह री ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2377) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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