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गुरुवार, जून 30, 2016

बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

रुस्वाई-ए-शहर का बहाना ज़ुरूर है
उसको तो मेरे सिम्त से जाना ज़ुरूर है

मुझको पता है जान! रक़ीबों के वास्ते
बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

मैं इक निग़ाह डाल भी सकता नहीं हूँ गो
वह मेरे टूटे दिल का फ़साना ज़ुरूर है

आई न मेरी याद तुझे औ मैं आ गया
पहलू में तेरे शाम बिताना ज़ुरूर है

महफ़िल में छा गया है ग़ज़ब फिर भी किस तरह
ग़ाफ़िल का शे’र गोया पुराना ज़ुरूर है

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-07-2016) को "बरसो बदरवा" (चर्चा अंक-2391) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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