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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, December 14, 2019

आँखों के तीर और सँभाले न जाएँगे

है कोढ़ गर तो कोढ़ के छाले न जाएँगे
जो जो भी कारनामें हैं काले न जाएँगे

आएगा वक़्त जाने का जब मैक़दे से घर
हम कोई भी हों साथ ये प्याले न जाएँगे

अब तो हुज़ूर आइए मैदाने जंग में
आँखों के तीर और सँभाले न जाएँगे

रखना है बज़्म में तो मिले तौर की जगह
कहना फ़क़त है क्या के निकाले न जाएँगे

ग़ाफ़िल जी जा चुके हैं जो करते हैं जी की बात
अश्आर मगर बेचने वाले न जाएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-12-2019) को    "मन ही तो है"   (चर्चा अंक-3552)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ....... ,.....18 दिसंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. अब तो हुज़ूर आइए मैदाने जंग में
    आँखों के तीर और सँभाले न जाएँगे
    .
    लाज़वाब पंक्तियाँ। वाह आदरणीय। सादर नमन।

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