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रविवार, मई 29, 2011

दूर क्यूँ मुझको लगा शख़्स वो मंज़िल की तरह

चाहा मैंने जो किसी को भी कभी दिल की तरह
दूर क्यूँ मुझको लगा शख़्स वो मंजिल की तरह

ज़िंदाँ-ए-ज़ुल्फ़ में हूँ क़ैद ज़माने से अब
कोई आ जाये मेरे वास्ते काफ़िल की तरह

उसकी है तीरे नज़र रू-ब-रू दिल है मेरा
पेश आये तो कभी हाय वो क़ातिल की तरह

उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा मैंने
अब चले साथ कोई चाहे मुक़ाबिल की तरह

आज आवारगी-ए-दिल का मेरे सोहरा है
तेरे कूचे में जो भटके है वो ग़ाफ़िल की तरह

(ज़िंदाँ-ए-ज़ुल्फ़=ज़ुल्फ़ों का क़ैदखाना, काफ़िल=ज़ामिन)
                                                                    -ग़ाफ़िल

19 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  2. आदरणीया संगीता जी नमस्ते!
    प्रथमतः मेरी रचना चर्चा मंच पर शामिल करने के लिए आपको कोटिशः धन्यवाद। आज के चर्चा मंच पर आपने जिन मोतियों की बानगी रखी है वो सभी वाकई अनमोल हैं। इनमें आनन्द द्विवेदी जी की ग़ज़ल ‘ख़त लिख रहा हूँ तुमको’, वंदना गुप्ता जी की प्रस्तुति ‘प्रेम का कैनवास’, बाबूषा की ‘मैं एक स्लेटी पहाड़ी हूँ’, आकुल जी की ‘इस तरह से’, रेखा जी का ‘दर्द किसी सूने घर का’ अरुण कुमार निगम की रचना ‘चैत की चंदनिया’ डॉ0 कविता किरण जी की ग़ज़ल ‘अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ’, सैल जी की ग़ज़ल ‘ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या’, रश्मि प्रभा जी की रचना ‘अमृत देवता के हाथ’ तथा अन्य सभी रचनाएँ मन के तार को झंकृत कर देने में पुर्णतः सक्षम हैं। समीर लाल जी ‘समीर’ की ग़ज़ल ‘अभी कुछ और बाकी है विशेष उल्लेखनीय है। समीर लाल जी बड़े हस्ताक्षर हैं, उनके बारे में कुछ भी कहना सूरज को दीया दिखाना ही है। पुनः बहुत-बहुत आभार।
    -ग़ाफ़िल

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  3. ग़ाफ़िल सर!
    चर्चा मंच जैसा प्लेटफार्म आपकी रचना को मिला, बधाई! वैसे यह अनायास नहीं है। आपका प्रयास दिल को छू लेता है- ‘‘पेश आये तो कभी हाय वो कातिल की तरह’’। बहुत अच्छा।।

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  4. es saflata ke liye hardik badhai.... such hi hai baat niklegi to phir door talak jayegi...

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  5. आप सभी सुधी जनों को मेरी रचना मनोयोग से पढ़ने और उस पर टिप्पणी करने के लिए हार्दिक धन्यवाद। मयंक जी से आग्रह है कि आइंदा भी इसी तरह हमें प्रोत्साहित करते रहेंगे। उनका प्रोत्साहन मेरे लिए ख़ास है।
    -ग़ाफ़िल

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  6. सच है मंज़िल दूर ही होती जाती है...बहुत बढ़िया, बधाई

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  7. बेहतरीन गजल गाफिल साहब ||
    बधाई ||

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  8. शनिवार १७-९-११ को आपकी पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया पधार कर अपने सुविचार ज़रूर दें ...!!आभार.

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  9. बहुत ही बढ़िया । सुन्दर..|

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  10. वाह ...बहुत खूब कहा है आपने हर पंक्ति बेहतरीन बन पड़ी है ।

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  11. उम्र का लम्बा सफ़र तै किया तन्हा मैंने,
    अब चले साथ कोई चाहे मुक़ाबिल की तरह।

    अब क्या फर्क पड़ता है .......वाह गाफिल जी !

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  12. बहुत खूबसूरती सेजीवन का फ़लसफ़ा व्यक्त किया है!

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