Wednesday, August 03, 2011

जो तोड़ी गयी है वो नाज़ुक कली है

तेरे सिम्त सजती हैं बज़्मे-बहाराँ,
मेरे सू तो मेरी ही शैदादिली है।
तुझे हो मुबारक़ ज़माने की रँगत,
ता'हद्दे-नज़र मेरे स्याही खिली है॥

नयी क़ैफ़ियत ये नये दौर की है,
तिहीदस्ती फ़ैय्याज़ों में जोर की है।
समन्दर के दर पे भी जा करके देखा,
मेरी प्यास उससे कहीं भी भली है॥

वो ताबानी सूरज की बदली में गुम है,
चमक चाँदनी की भी जुगुनू से कम है।
हैं दरिया की लहरें सराबी-शिगूफा,
सज़र भी हैं मुफ़लिस, हवा बद चली है॥

गया सूख बेवक़्त आँखों का पानी,
नहीं गीत में भी है कोई रवानी।
छमक भी है गायब सभी पायलों से,
पड़ी आज सूनी सी सुर की गली है॥

हुई किस क़दर रात चोरी यहाँ पे,
बता चाँद सबकी है ख़ूबी कहाँ पे।
जो गुल ख़ूबसूरत तो ख़ुश्बू जुदा है,
जो तोड़ी गयी है वो नाज़ुक कली है॥

अगन ने जलाया मेरा आशियाना,
ये ग़ाफ़िल भी है आज कैसा बेगाना।
हरी वादियों का हुआ रंग ख़ूनी,
चिता आल की देखो पहले जली है॥

(सू=तरफ़, तिहीदस्ती=हाथ का खालीपन, फ़ैयाज=दानी, सराबी-शिगूफ़ा=मृगमरीचिका जैसा भ्रम, आल=नाती,पोते)

Tuesday, August 02, 2011

क्या बताऊँ के क्या ग़ज़ब देखा

आँख भर मैंने तुझको जब देखा।
क्या बताऊँ के क्या ग़ज़ब देखा॥

दिल भी धड़का है, ओंठ भी मचले,
मैंने जो यह तेरा ग़बब देखा।

लाम से ग़ेसुओं की गुस्ताख़ी,
तेरे रुख़सार का करब देखा।

ये ख़ुदकुशी है या अदा-क़ातिल,
के चमिश में भी इक अदब देखा।

दिल मेरा तेरी कमाने-अब्रू,
और न मौत का सबब देखा।

तीर आकर जिगर के पार हुआ,
हाय! 'ग़ाफ़िल' ने उसको तब देखा।

( ग़बब=ठुड्ढ़ी के नीचे का मासल भाग, क़रब=बेचैन होना, बेचैनी, दुःखी होना
चमिश=लचक, इठलाहट )
                                    -'ग़ाफ़िल'