Thursday, September 05, 2013

फिर भी नफ़रत सीख ले!

मान जा ऐ दिल
है बड़ी मुश्क़िल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

तुझको जीना है
जख़्म सीना है
रात काली है
और दिवाली है

लुट चुकी अस्मत
मिट चुकी क़िस्मत
हुस्न है फन्दा
फंस गया बन्दा

कहता ये ग़ाफ़िल
ना भी बन क़ातिल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

मान जा ऐ दिल
है बड़ी मुश्क़िल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

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Sunday, August 25, 2013

फिर क़यामत के प्यार लिख डाला

फिर क़यामत के प्यार लिख डाला।
और फिर ऐतबार लिख डाला।।

लिखना चाहा उसे जभी दुश्मन,
न पता कैसे यार लिख डाला।

उसने क़ातिल निगाह फिर डाली,
उसको फिर ग़मगुसार लिख डाला।

याद आती न अब उसे मेरी,
मैंने तो यादगार लिख डाला।

लिखते लिखते न लिख सका कुछ तो,
तंग आ करके दार लिख डाला।

मैं हूँ ग़ाफ़िल यूँ ग़फ़लतन ये ग़ज़ल,
देखिए क़िस्तवार लिख डाला।।

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