Tuesday, December 24, 2013

अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

हवा का इक झोंका हूँ मैं
नहीं टोकी-टोका हूँ मैं
न आऊँ तो मेरा इंतजार
आ भी जाऊँ तो सिर्फ़ बयार
तुम्हारी साँसों का उच्छ्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

धरूँ मैं रूप अगर विकराल
बनूं फिर महाकाल का काल
बनूं जो मन्द-सुगन्ध-समीर
हरूँ प्रति हिय की दारुण पीर
संयोगीजन का हृद-उल्लास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

प्रकृति की भाव-तरणि निर्द्वन्द्व
तैरती प्रमुदित मन स्वच्छन्द
कर रही सृष्टि-सिन्धु को पार
डाल मुझ पर सारा सम्भार
एक ग़ाफ़िल पर यह विश्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?



Saturday, December 07, 2013

इसी मोड़ से अभी है गया कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

ये मक़ाम भी है पड़ाव ही मिला सब यहाँ और कुछ नहीं
है वो तन्‌हा राह ही दिख रही है जूँ कारवाँ और कुछ नहीं

थे सटे सटे से वो फ़ासले हैं हटी हटी ये करीबियाँ
मेरी ज़िन्‍दगी की है मौज़ यूँ ही रवाँ रवाँ और कुछ नहीं

कोई रौशनी किसी रात का जो हसीन ख़्वाब जला गयी
हुई सुब्ह तो था हुज़ूम भर व बयाँ बयाँ और कुछ नहीं

अरे! कोह की वो बुलंदियाँ और वादियों का वो गहरापन
खुली आँख तो मुझे दिख रहा था धुआँ धुआँ और कुछ नहीं

ये जो गर्द इतनी है उड़ रही भला क्यूँ इसे भी तो जान लो
इसी मोड़ से अभी है गया कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

-‘ग़ाफ़िल’