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Tuesday, December 24, 2013

अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

हवा का इक झोंका हूँ मैं
नहीं टोकी-टोका हूँ मैं
न आऊँ तो मेरा इंतजार
आ भी जाऊँ तो सिर्फ़ बयार
तुम्हारी साँसों का उच्छ्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

धरूँ मैं रूप अगर विकराल
बनूं फिर महाकाल का काल
बनूं जो मन्द-सुगन्ध-समीर
हरूँ प्रति हिय की दारुण पीर
संयोगीजन का हृद-उल्लास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

प्रकृति की भाव-तरणि निर्द्वन्द्व
तैरती प्रमुदित मन स्वच्छन्द
कर रही सृष्टि-सिन्धु को पार
डाल मुझ पर सारा सम्भार
एक ग़ाफ़िल पर यह विश्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?



23 comments:

  1. बहुत सुन्दर आत्मविश्वास से भरी प्रस्तुति बहुत खूब ,बधाई आपको

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-12-13) को "सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा" (चर्चा मंच : अंक-1472) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ख़ास बनाने के कारणों पर आपकी कलम खूब चली
    नए साल कि शुभकानाए

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    1. हा हा हा हा धन्यवाद भाई पाण्डेय जी!

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  4. प्रकृति की भाव-तरणि निर्द्वन्द्व
    तैरती प्रमुदित मन स्वच्छन्द
    कर रही सृष्टि-सिन्धु को पार
    डाल मुझ पर सारा सम्भार

    बहुत सुंदर प्रस्तुति ....

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  5. हवा का इक झोंका हूँ मैं
    नहीं टोकी-टोका हूँ मैं
    न आऊँ तो मेरा इंतजार
    आ भी जाऊँ तो सिर्फ़ बयार
    तुम्हारी साँसों का उच्छ्वास
    अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

    बहु आयामी प्रकृति की नट लीला से संसिक्त रचना।

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    1. राम राम भाई! आपकी जय हो बहुत बहुत शुक़्रिया और आभार आपका

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  6. जी बिलकुल सही लिखा आपने .. यही विश्वास तो एक आम व्यक्ति को खास बनाता है !

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  7. उम्दा पोस्ट |सशक्त रचना |

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  8. ग़ाफ़िल जी ....आप तो खासमखास हैं .....
    शुभकामनायें!

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    1. अशोक जी उत्साहवर्द्धन के लिए बहुत-बहुत शुक़्रिया!

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  9. बहुत सुंदर भाव..शब्दों का चयन भी उत्तम है

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  10. हाय हाय हाय …क्या कहने

    वाह वाह

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    1. अलबेला भाई साहब आदाब और शुक़्रिया भी लेते जाओ लगे हाथ हाँ नहीं तो!

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