Monday, September 12, 2016

दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

जल रहीं जो याँ दिलों की बस्तियाँ
कब गिरीं इक साथ इतनी बिजलियाँ

बातियों में अब नहीं लज़्ज़त रही
अब बिगाड़ेंगी भला क्या आँधियाँ

अंजुमन भी किस तरह का अंजुमन
हों न गर तेरी मेरी सरगोशियाँ

जिस जगह भी मैं कभी आया गया
उस जगह कितनी हैं पहरेदारियाँ

गो के अब तक तो नहीं ऐसा हुआ
हैं बहुत ख़ामोश सी ख़ामोशियाँ

क्यूँ लुटा मैं दे रहीं इसका जवाब
किस अदा से आपकी बेताबियाँ

तब कहाँ थे आप मेरे ग़मग़ुसार
जब मुझे डंसती रहीं तन्हाइयाँ

निभ नहीं पाएँगी ग़ाफिल जी कभी
दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, September 10, 2016

मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

जला है जी मेरा और उसपे मुझसे ही शिक़ायत है
न कहना अब के ग़ाफ़िल यूँ ही तो होती मुहब्बत है

मुझे तो होश आ जाए कोई पानी छिड़क दे बस
तेरा होगा भला क्या तेरी तो रिन्दों की सुह्बत है

हुई है राह इक तो अब मुहब्बत हो ही जाएगी
अगर इंसानियत की जी को थोड़ी सी भी आदत है

नहीं मिलता कभी साहिल सफ़ीना-ए-मुहब्बत को
ख़ुदारा हुस्न के सागर में क्यूँ होती ये क़िल्लत है

कभी रंगीन दुनिया के मुझे सपने नहीं आते
मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

तू पैताने रक़ीबों के हूमेशा है नज़र आता
तेरी इस हुस्न की महफ़िल में क्या इतनी ही क़ीमत है

-‘ग़ाफ़िल’