Monday, April 03, 2017

हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

जैसे भी चाहे कोई वैसे रहे
जब तलक ज़़े़े़े़ेरे जिगर मेरे रहे

हो चुका है गर ज़माना ग़ैर का
आप भी तो अब कहाँ अपने रहे

ठीक है डंडे जमाओ इश्क़ पर
हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

मस्त है अपनी ही धुन में हर कोई
किसको समझाए कोई कैसे रहे

झंड है ग़ाफ़िल जी अपनी ज़िन्दगी
हम न घर के ही न बाहर के रहे

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, April 01, 2017

ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

सब्ज़ शजर को अंगारों से क्या लेना
एक बाग़बाँ को आरों से क्या लेना

भौंरे तो गुल का रस लेते हैं उनको
ऐ गुलाब तेरे ख़ारों से क्या लेना

चश्म देख सकते हैं फ़क़त बदन सबके
उनको सबके किरदारों से क्या लेना

लाख बनाता रहे राइफ़ल पिस्टल तू
उल्फ़त में इन हथियारों से क्या लेना

है रसूल देने वाला जब, फिर मुझको
दिल के मुफ़्लिस दरबारों से क्या लेना

हूँ मुरीद तेरा मौला, तू हुक़्म करे
मुझको तेरे हरकारों से क्या लेना

सुह्बत सेहतमंदों की होती अच्छी
ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

-‘ग़ाफ़िल’