Tuesday, July 04, 2017

भाते हैं गो मुझे भी नफ़ासत के रास्ते

तक़्दीर है के चलता हूँ ग़ुरबत के रास्ते
भाते हैं गो मुझे भी नफ़ासत के रास्ते

मेरे लिए ही बन्द हुई जा रही है क्यूँ
वह क़ू जहाँ से जाते हैं किस्मत के रास्ते

तुह्मत लगाई जाती यूँ आवारगी की क्या
चल देता गर कभी मैं ज़ुरूरत के रास्ते

पा जाऊँगा ही तुझको हो ग़ाफ़िल यक़ीं अगर
तो क्यूँ क़ुबूल कर न लूँ ज़ुर्रत के रास्ते

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, July 03, 2017

काश! के फिर बन पाता रिश्ता

अब दुश्वार है जीसस बनना
गया रिवाज़ सलीबों वाला

ख़ारेपन से बच जाता गर
सागर थोड़ा भी रो लेता

सर्पिल सी इक पगडण्डी से
काश! के फिर बन पाता रिश्ता

अब वह शायद टूट चुकी है
जिस टहनी पर चाँद टँगा था

लौट आओगे तब न दिखेगा!
बूढ़ा पीपल बाट जोहता

लगने लगा अब ख़्वाब मुझे क्यूँ
ओरी छप्पर पानी झरता

ग़ाफ़िल गौरइयों के चूजे
कोटर वाला साँप खा गया

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)