Wednesday, July 12, 2017

जाम खाली न हुआ और वो भर जाता है

है लगे आज रुकेगा वो मगर जाता है
क्या पता है के कहाँ सुब्ह क़मर जाता है

लोग आते हैं चले जाते है कर तन्हा मुझे
तू तो रुक जाए इधर यार किधर जाता है

आया है करने जो आबाद मेरे दिल का नगर
उसको तो रुकना ही था देखिए पर जाता है

इस क़दर चाहने वाला है मेरा भी कोई
जाम खाली न हुआ और वो भर जाता है

बाद दीदार के तेरे है अजब ये होता
आईना देख मुझे ख़ुद ही सँवर जाता है

हूँ तो ग़ाफ़िल ही मगर तुझसे तो इस तर्ह नहीं
के मेरे नाम पे जैसे तू बिफर जाता है

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, July 05, 2017

कोई शब् भर मनाता था किसी का रूठ जाना था

आदाब! दो शे’र आप सबको नज़्र-

तसव्वुर में गुज़ारीं जागकर मैंने कई शब् पर
उन्हें आना नहीं आया जिन्हें ख़्वाबों में आना था

हसीं रातें थीं वे फिर भी भले तारीक रातें थीं
कोई शब् भर मनाता था किसी का रूठ जाना था

-‘ग़ाफ़िल’