Thursday, March 22, 2018

ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

मुझे तू भूल जाता है मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं रहता हूँ तेरे दिल में तुझे यह क्या नहीं लगता?

निग़ाहे लुत्फ़ तेरा है उधर रुख़ है इधर ऐसे
मुहब्‍बत आज़माना क्‍या तमाशा सा नहीं लगता?

मैं वापस आ ही जाता हूँ वहीं चलता जहाँ से हूँ
ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

तू होता है जो ग़मगीं रू मेरा भी ज़र्द होता है
फिर अपने बीच तुझको क्यूँ कोई रिश्ता नहीं लगता

घुला हो ज़ह्र कितना भी तेरी शोख़े बयानी में
मैं पी जाता हूँ हँस हँस कर मुझे तीखा नहीं लगता

रक़ीबों पर क़रम तेरा न मेरी जाँ पे आ जाए
तू मेरा है मगर अक़्सर मुझे मेरा नहीं लगता

तेरे आते ही ग़ाफ़िल बज़्म में आ जाती है रौनक़
बताना सच के तुझको क्या कभी ऐसा नहीं लगता?

-‘ग़ाफ़िाल’

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Saturday, March 17, 2018

ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

रुख़ पे उल्फ़त के जो जेवर नहीं देखे जाते
आईने ऐसे भी शब भर नहीं देखे जाते

देखा जाता है महज़ उड़ता है कितना कोई
उड़ने वालों के कभी पर नहीं देखे जाते

ये ही क्‍या कम है के हो जाते हैं जी को महसूस
आप इस तर्फ़ तो अक़्सर नहीं देखे जाते

हो तबस्सुम जो लबों पर तो बने बात भी कुछ
ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

आओ क्यूँ हम भी न इस जश्न में शामिल हो लें
खेल अब इश्क़ के छुपकर नहीं देखे जाते

आएगी वस्ल की शब अपनी भी क्या ग़ाफ़िल जी
आप तो अपने से बाहर नहीं देखे जाते

-‘ग़ाफ़िल’