Sunday, October 13, 2013

समझो बहार आई

गुंचा जो मुस्कुराए समझो बहार आई
भौंरा जो गीत गाए समझो बहार आई

सुलझी हुई सी पूरी ये प्यार वाली डोरी
फिर से गर उलझ जाए समझो बहार आई

सूरत की भोली-भाली वह क़त्ल करने वाली
ख़ुद क़त्ल होने आए समझो बहार आई

कर दे क़रिश्मा जो रब अपनी विसाल की शब
गुज़रे न थम सी जाए समझो बहार आई

गोया कि है ये मुश्किल कोई हुस्न इश्क़ को फिर
आकर गले लगाए समझो बहार आई

ग़ाफ़िल भी जिसका अक्सर जगना ही है मुक़द्दर
सपने अगर सजाए समझो बहार आई

Thursday, October 10, 2013

पर ग़ज़ल गुनगुनाने को दिल चाहिए

मेरे सपनों में आने को दिल चाहिए
और मुझे आजमाने को दिल चाहिए

बात बिगड़ी हुई भी है बनती मगर
बात बिगड़ी बनाने को दिल चाहिए

याद में मेरी मुद्दत से आए न वे
याद में मेरी आने को दिल चाहिए

बात सुनने सुनाने से हासिल भी क्या
बात सुनने सुनाने को दिल चाहिए

आईना देखते तो हैं सब बारहा
आईना पर दिखाने को दिल चाहिए

होश में जोश आता है किसको भला
होश में जोश लाने को दिल चाहिए

दिल को लूटा है सब ने बड़े शौक से
शौक से दिल लुटाने को दिल चाहिए

बोतलों से ढलाना है आसाँ बहुत
चश्म से मय ढलाने को दिल चाहिए

गोया रिश्ते बनाना तो मामूल है
फिर भी रिश्ते निभाने को दिल चाहिए

एक ग़ाफ़िल ने भी लिख तो डाली ग़ज़ल
पर ग़ज़ल गुनगुनाने को दिल चाहिए

हाँ नहीं तो!