Wednesday, November 29, 2017

स्वाती की इक बूँद

अब न चातक को रही स्वाती की इक बूँद की आस
था पता किसको ज़माना यूँ बदल जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

Friday, November 24, 2017

हम अक़्सर देखे हैं

दर पर तेरे रोज़ रगड़ते पेशानी
हुस्न! हम कई शाह कलन्दर देखे हैं

संगमरमरी ताज की दीवारों पर भी
दाग़ खोजते लोग हम अक़्सर देखे हैं

-‘ग़ाफ़िल’