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बुधवार, अक्तूबर 06, 2010

सुबरन गिरि बेकार

एक ऐसी रचना जो सहज ही रीतिकाल की सैर करा दे-

पीनपयोधर प्रबलतम, तन्वी तन का सार।
तासु तुलन मा जानिए, सुबरन गिरि बेकार॥
सुबरन-गिरि बेकार, सदा सबका भरमावै;
रहै कल्पना मध्य, हाथ तँह पहुँचि न पावै।
'ग़ाफ़िल' नैन निहाल, निरखि कुच रचना सुन्दर;
साहस कर कर बढ़ै, हाथ मँह पीनपयोधर॥
                                                                  -ghafil

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई...रीतिकाल की सैर हो गई...

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  2. याँ पे तो बिन बुलाए चले आइए ज़नाब! ख़ुश होइए भी और ख़ुशी लुटाइए ज़नाब! अब आ ही गये मेरे अंजुमन में तो रुकिए, जाना है तो चुपके से चले जाइए ज़नाब! बन तो गया हूँ बुत मैं, भले संगेमरमरी, अब छोड़िए भी और ना बनाइए ज़नाब! 'ग़ाफ़िल' हूँ मेरी बात हँसी में उड़ाइए, ख़ुद पे यक़ीन हो तो मुस्कुराइए ज़नाब! -ग़ाफ़िल

    I'm Ramakant Pandey, like your humor and writing skill.+919634411619

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