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मंगलवार, जुलाई 30, 2013

आख़िर मैंने चान (चाँद) लिख दिया

आख़िर मैंने चान (चाँद) लिख दिया।
सागर में तूफ़ान लिख दिया॥

आसमान में इक तारे सँग,
मस्ती करता उजियारे सँग,
छत पर मुझको लखा व्यँग्य से,
झट मैंने व्यवधान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

चान गया फिर बूढ़े वट पर,
अश्रु-चाँदनी टप-टपकाकर
मुझको द्रवित कर दिया चन्ना,
मैंने निर्भयदान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

दरिया अपनी रौ में चलती
सिमट-सकुच सागर से मिलती,
ग़ाफ़िल तुझको क्या सूझी के
बिन बूझे गुणगान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

हाँ नहीं तो!

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बुधवार (31-07-2013) के कीचड़ तो तैयार, मगर क्या कमल खिलेंगे-- चर्चा मंच 1323 में मयंक का कोना पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. चांद भी आंसू टपकाता है आपको व्यंग से भी देखता है । सुंदर रचना, हां नही तो ।

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  3. क्या बात है !क्या बात है !क्या बात है !बेहतरीन है ताज़ा तरीन है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया है भाई जी-
    बहुत दिनों बाद पढ़ा आपको-
    सादर-

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर रही चान से मुलाकात !

    उत्तर देंहटाएं
  6. गाफ़िल तुझको क्या सूझी के बिन बूझे ये गुनगान लिख दिया?

    उत्तर देंहटाएं
  7. बिन बूझे गुणगान लिख दिया।
    आख़िर मैंने चान लिख दिया॥


    sunder!

    उत्तर देंहटाएं


  8. दरिया अपनी रौ में चलती
    सिमट-सकुच सागर से मिलती,
    ग़ाफ़िल तुझको क्या सूझी के
    बिन बूझे गुणगान लिख दिया।
    आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

    वाह वाह वाह !
    आदरणीय चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल‘ जी

    क्या कमाल लिखते हैं !

    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...

    ♥ रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं ! ♥
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  9. ग़ाफ़िल तुझको क्या सूझी के
    बिन बूझे गुणगान लिख दिया----क्या कमाल लिखते हैं !ऐसा ही लिखते रहिये
    latest post नेताजी फ़िक्र ना करो!
    latest post नेता उवाच !!!

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