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मंगलवार, मार्च 24, 2015

क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ

स्वच्छ धवल आँचल लहराती,
नागिन के समान बलखाती,
कलकल कर बहती नदिया में,
कंकड़ एक मार कर मैं क्यूँ
खलनायक जग में कहलाऊँ,
क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ।

1 टिप्पणी:

  1. नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (25-03-2015) को "ज्ञान हारा प्रेम से " (चर्चा - 1928) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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