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गुरुवार, जून 02, 2016

हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

तुह्मत तो आप हम पर थे शौक से लगाए
है दाद बाँटनी तो हम क्यूँ न याद आए

गर इश्क़ हम किये तो फ़र्मा दिए भी सच सच
हम जब भी मात खाए तो इस सबब ही खाए

हुस्नो हसब ही बाइस उसके गुरूर के हैं
पर क्या पड़ी है किसको उसको जो यह बताए

छेड़ा तो इश्क़ का सुर दिल ने हमारे लेकिन
नखरों के उसके चलते वह टूट ही न जाए

शमशान तक ही चाहे जाना तो लाज़िमी है
ज़न्नत किसे मिली है घर बैठे और बिठाए

दुनिया-ए-इश्क़ का भी हो क्या बयान ग़ाफ़िल
हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-06-2016) को "दो जून की रोटी" (चर्चा अंक-2362) (चर्चा अंक-2356) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. शमशान तक ही चाहे जाना तो लाज़िमी है
    ज़न्नत किसे मिली है घर बैठे और बिठाए

    Bahut khoob!

    उत्तर देंहटाएं