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गुरुवार, जुलाई 14, 2016

मगर सच में तू दम भरता नहीं है

कभी मुझसा कोई कहता नहीं है
मगर कोई मेरी सुनता नहीं है

हज़ारों हैं रहे उल्फ़त में लेकिन
कोई तुमसा मुझे जँचता नहीं है

अरे! तू मुस्कुरा लेता है कैसे
ये ग़ुस्ताख़ी कोई करता नहीं है

यूँ पर्दादारी भी क्या पर्दादारी
दुपट्टा अब तेरा उड़ता नहीं है

बड़े अफ़सोस की है बात अब तू
अदा-ए-शोख़ पर मरता नहीं है

है चर्चे में तेरी वादाखि़लाफ़ी
मगर तू शर्म से गड़ता नहीं है

मसन्निफ़ कम नहीं हैं आज यारो!
हक़ीक़त पर कोई लिखता नहीं है

तुझे मंज़िल तो मिल जाती ही ‘ग़ाफ़िल’
मगर सच में तू दम भरता नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-07-2016) को "धरती पर हरियाली छाई" (चर्चा अंक-2405) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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