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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, July 19, 2016

ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

अश्कों को रोकता हूँ मैं रुकते मगर नहीं
आतिश हैं वो के आब हैं उनको ख़बर नहीं

इस शह्र के हैं लोग अजब ही ख़याले ख़ाम
दुश्मन भी गर मिले तो मिले मातिबर नहीं

भड़केगी आग और हो जाएगा ख़ाक तू
आतिशजनी से होगा अलग अब भी गर नहीं

पूछें यही सभी के मिलोगे किधर जनाब
मैं कह रहा हूँ जबके मैं रहता किधर नहीं

आती नहीं है नींद के जैसे कहा हूँ मैं
जाना जिधर हो जाए पर आए इधर नहीं

ग़ाफ़िल भी चाहता है के आदत में हो शुमार
ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-07-2016) को "खिलता सुमन गुलाब" (चर्चा अंक-2410) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 22/07/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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