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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, July 26, 2016

रात ही जब हुई मुख़्तसर

गो है आवारगी बेश्तर
हो गए शे’र अपने मगर

एक क़त्आ-

क्या गुमाँ नाज़नीनों को है
क्यूँ हैं घबराए हम इस क़दर
आई टोली है जब पील की
टूटते ही रहे हैं शजर

और तमाम अश्आर-

मेरे अरमाँ सहम से गये
डाली तूने है कैसी नज़र

तेरे आने की हो क्यूँ ख़ुशी
तेरे जाने की है जब ख़बर

रौशनी हो सकी क्या, ये दिल
जबके जलता रहा रात भर

राबिते की वज़ह भी तो है
रूठना तेरा हर बात पर

मक़्ताशुदा एक और क़त्आ-

मंज़िले इश्क़ सर हो तो क्यूँ
रात ही जब हुई मुख़्तसर
वरना तो इश्क़ फ़र्माने को
एक ग़ाफ़िल भी रक्खे जिगर

-‘ग़ाफ़िल’

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