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गुरुवार, जुलाई 28, 2016

भूल जाओ किसका आना रह गया

क्या बताऊँ? क्या बताना रह गया
सोचता बस यह, ज़माना रह गया

क्या यही चारागरी है चारागर!
जख़्म जो था, वो पुराना...! रह गया

लोग आए, शाम की, जाते बने
रह गया तो बादाख़ाना रह गया

इश्क़ में है जी जला फिर जिस्म भी
तू बता अब क्या जलाना रह गया

है कहाँ अब थी जो लज़्ज़त प्यार की
याद करने को फ़साना रह गया

आप ग़ाफ़िल जी लिखे जाओ अश्आर
भूल जाओ किसका आना रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. इश्क़ में है जी जला फिर जिस्म भी , तू बता अब क्या जलाना रह गया ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;वाह वाह वाह , क्या बात , क्या बात , क्या बात??????????????????????????????????????????

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (29-07-2016) को "हास्य रिश्तों को मजबूत करता है" (चर्चा अंक-2418) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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