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गुरुवार, सितंबर 15, 2016

या तो इस पार की या तो उस पार की

अब तलक जो हुई सब थी बेकार की
चाहिए बात हो अब ज़रा प्यार की

खिलके गुंचे भी तो हो गए फूल सब
ख़ूबसूरत घड़ी है ये इज़हार की

गर सुनाने लगा मैं कभी हाले दिल
बात चल जाएगी तुझसे तकरार की

हुस्न के तो क़सीदे पढ़े जा रहे
याद जाती रही इश्क़ के मार की

आह! रुस्वाइयाँ हो रहीं बारहा
उस मुहब्बत की जो मैंने इक बार की

जो भी होना है ग़ाफ़िल जी हो जाए अब
या तो इस पार की या तो उस पार की

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2016) को "अब ख़ुशी से खिलखिलाना आ गया है" (चर्चा अंक-2468) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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