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बुधवार, सितंबर 21, 2016

सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

तू मना कर दिया जाने क्या जानकर
सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

पा लिया मैं ख़ुशी उम्र भर की सनम
दो घड़ी ही भले तुझको मिह्मान कर

फिर रहे क्यूँ शिक़ायत, अगरचे मिले
आदमी आदमी को भी पहचान कर

मैं तुझे खोजता ही रहा तू मुझे
किस तरह एक दूजे का अनुमान कर

मैं चला जाऊँगा तेरे कूचे से तू
भूल जाना मुझे बेवफ़ा मान कर

मैं कहा तो था ग़ाफ़िल सुना तू कहाँ
यह के यूँ अपने दिल की न दूकान कर

-‘ग़ाफ़िल’

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2473 में दी जाएगी
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-09-2016) को "नेता श्रद्धांजलि तो ट्विटर पर ही दे जाते हैं" (चर्चा अंक-2474) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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