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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, December 05, 2016

किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

भले दिन रात हरचाता बहुत है
मगर मुझको तो वह प्यारा बहुत है

वो हँसता है बहुत पर बाद उसके
ख़ुदा जाने क्यूँ पछताता बहुत है

जुड़ा है साथ काँटा जिस किसी के
उसी गुल का यहाँ रुत्बा बहुत है

है जिसके हर तरफ़ पानी ही पानी
समन्दर सा वही प्यासा बहुत है

मैं जगता रोज़ो शब हूँ इसलिए भी
के वक़्ते आखि़री सोना बहुत है

अगर ख़ुद्दार है तो डूबने को
सुना हूँ आब इक लोटा बहुत है

है राह आसान रुस्वाई की सो अब
उसी पर आदमी चलता बहुत है

न हो पाया भले इक शे’र तो क्या
किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-12-2016) को "देश बदल रहा है..." (चर्चा अंक-2548) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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