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गुरुवार, दिसंबर 08, 2016

तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है

गो आदत न थी डूबने की मेरी पर
तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है
गया मैं सहर को अगर तेरे दर से
मुझे शाम तक लौट आना पड़ा है

-‘ग़ाफ़िल’


1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-12-2016) को "काँप रहा मन और तन" (चर्चा अंक-2551) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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