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गुरुवार, सितंबर 29, 2016

तुह्मत तो लाजवाब मिले, होश में हूँ मैं

मुझको तो अब शराब मिले, होश में हूँ मैं
और वह भी बेहिसाब मिले, होश में हूँ मैं

सच्चाइयों से ऊब चुका हूँ बुरी तरह
अब इक हसीन ख़्वाब मिले, होश में हूँ मैं

मेरे किये का ख़ाक मिलेगा मुझे सवाब
तुह्मत तो लाजवाब मिले, होश में हूँ मैं

अर्ज़ी मेरी क़ुबूल हो उल्फ़त की आज ही
या तो मुझे जवाब मिले, होश में हूँ मैं

ग़ाफ़िल समझ के बात जुगनुओं पे टाल मत
अब मुझको माहताब मिले, होश में हूँ मैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 24, 2016

बड़ी मग़रूर किस्मत हो गई है

हमें जबसे मुहब्बत हो गई है
मुहब्बत भी सियासत हो गई है

चलो फिर इश्क़ में खाते हैं धोखा
हमें तो इसकी आदत हो गई है

गया चैनो सुक़ूँ यानी के सब कुछ
कहें भी क्या के उल्फ़त हो गई है

जिए जाते हैं फिर भी देखिए हम
गो बेग़ैरत सी ग़ैरत हो गई है

फ़क़त हमसे है पर्दा क्या समझ लूँ
किसी की हमपे नीयत हो गई है

तेरे जाने से उजड़े घोसले सी
हमारे दिल की हालत हो गई है

दुहाई बारहा देने से ग़ाफ़िल
बड़ी मग़रूर किस्मत हो गई है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 21, 2016

सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

तू मना कर दिया जाने क्या जानकर
सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

पा लिया मैं ख़ुशी उम्र भर की सनम
दो घड़ी ही भले तुझको मिह्मान कर

फिर रहे क्यूँ शिक़ायत, अगरचे मिले
आदमी आदमी को भी पहचान कर

मैं तुझे खोजता ही रहा तू मुझे
किस तरह एक दूजे का अनुमान कर

मैं चला जाऊँगा तेरे कूचे से तू
भूल जाना मुझे बेवफ़ा मान कर

मैं कहा तो था ग़ाफ़िल सुना तू कहाँ
यह के यूँ अपने दिल की न दूकान कर

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 15, 2016

या तो इस पार की या तो उस पार की

अब तलक जो हुई सब थी बेकार की
चाहिए बात हो अब ज़रा प्यार की

खिलके गुंचे भी तो हो गए फूल सब
ख़ूबसूरत घड़ी है ये इज़हार की

गर सुनाने लगा मैं कभी हाले दिल
बात चल जाएगी तुझसे तकरार की

हुस्न के तो क़सीदे पढ़े जा रहे
याद जाती रही इश्क़ के मार की

आह! रुस्वाइयाँ हो रहीं बारहा
उस मुहब्बत की जो मैंने इक बार की

जो भी होना है ग़ाफ़िल जी हो जाए अब
या तो इस पार की या तो उस पार की

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 14, 2016

मुझे ज़िन्दगी का नशा सा हुआ है

नहीं जानता तू के याँ क्या हुआ है
ग़ज़ब, तूने जो भी कहा था, हुआ है

फ़लक़ से यहाँ रात बरसी है आतिश
सहर कोहरे का तमाशा हुआ है

अरे अंदलीबों न बेफ़िक़्र रहना
ज़माना ही सय्याद जैसा हुआ है

तेरे सिम्त से लौट आया मेरा दिल
यही आज मेरा मुनाफ़ा हुआ है

भला क्यूँ सताए मुझे डर किसी का
क़फ़स यार मेरा भी झेला हुआ है

अजल रुक ज़रा, होश में आ तो जाऊँ
मुझे ज़िन्दगी का नशा सा हुआ है

तड़पता है ग़ाफ़िल वो उल्फ़त का भूखा
क़सम सैकड़ों जबके खाया हुआ है

(अंदलीब=बुलबुल, सय्याद=बहेलिया, सिम्त=तरफ़, क़फ़स=पिंजड़ा, अजल=मौत)

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 13, 2016

हुस्न कोई गर न टकराता कभी

तू बता मेरी तरफ देखा कभी
और देखा तो बुलाया क्या कभी

चाहेगा जब पास अपने पाएगा
क्या मुझे है ढूढना पड़ता कभी

तू नहीं करता परीशाँ गर मुझे
तो कहाँ होता कोई अपना कभी

ख़ाक बढ़ता प्यार का यह सिलसिला
हुस्न कोई गर न टकराता कभी

तिश्नगी, सैलाब मैंने एक साथ
आँख में अपने ही देखा था कभी

काश! जानिब से तेरी आती सदा
यूँ के ग़ाफ़िल अब यहाँ आजा कभी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 12, 2016

दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

जल रहीं जो याँ दिलों की बस्तियाँ
कब गिरीं इक साथ इतनी बिजलियाँ

बातियों में अब नहीं लज़्ज़त रही
अब बिगाड़ेंगी भला क्या आँधियाँ

अंजुमन भी किस तरह का अंजुमन
हों न गर तेरी मेरी सरगोशियाँ

जिस जगह भी मैं कभी आया गया
उस जगह कितनी हैं पहरेदारियाँ

गो के अब तक तो नहीं ऐसा हुआ
हैं बहुत ख़ामोश सी ख़ामोशियाँ

क्यूँ लुटा मैं दे रहीं इसका जवाब
किस अदा से आपकी बेताबियाँ

तब कहाँ थे आप मेरे ग़मग़ुसार
जब मुझे डंसती रहीं तन्हाइयाँ

निभ नहीं पाएँगी ग़ाफिल जी कभी
दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 10, 2016

मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

जला है जी मेरा और उसपे मुझसे ही शिक़ायत है
न कहना अब के ग़ाफ़िल यूँ ही तो होती मुहब्बत है

मुझे तो होश आ जाए कोई पानी छिड़क दे बस
तेरा होगा भला क्या तेरी तो रिन्दों की सुह्बत है

हुई है राह इक तो अब मुहब्बत हो ही जाएगी
अगर इंसानियत की जी को थोड़ी सी भी आदत है

नहीं मिलता कभी साहिल सफ़ीना-ए-मुहब्बत को
ख़ुदारा हुस्न के सागर में क्यूँ होती ये क़िल्लत है

कभी रंगीन दुनिया के मुझे सपने नहीं आते
मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

तू पैताने रक़ीबों के हूमेशा है नज़र आता
तेरी इस हुस्न की महफ़िल में क्या इतनी ही क़ीमत है

-‘ग़ाफ़िल’