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सोमवार, नवंबर 28, 2016

वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

बात क्या है के बना प्यार जताने वाला
घाव सीने में कभी था जो लगाने वाला

अब मेरे दिल में जो आता है चला जाता है क्यूँ
काश जाता न कभी याँ से हर आने वाला

ख़्वाब तो देखा मगर उसको न देखा मैं कभी
हाँ वही शख़्स था जो ख़्वाब दिखाने वाला

उसका चोरी से भी दीदार कहाँ मुम्क़िन है
जब हुआ ख़ुद का ही दिल शोर मचाने वाला

इश्क़ आतिश है मगर फिर भी नहीं उज़्र मुझे
है जो शोला ही उस आतिश पे चलाने वाला

जिसको जाना था गया पल को भी ठहरा न भले
चश्म से जाता रहा अश्क बहाने वाला

यार ग़ाफ़िल हो सँभलना तो सँभल जा अब भी
वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 24, 2016

सोचता हूँ तो है मुद्दआ कुछ नहीं

वस्ल का हिज़्र का सिलसिला कुछ नहीं
या के जी में तेरे था हुआ कुछ नहीं

लोग पाए हैं तुझसे बहुत कुछ अगर
तो मुझे भी मिला देख क्या कुछ नहीं

आदमी आदमी से परीशाँ है, क्या
आदमी आदमी का भला कुछ नहीं!

हाले दिल कह न पाया किसी तर्ह तो
कह दिया बस के जी! माज़रा कुछ नहीं

चाहता हूँ मैं लड़ता रहूँ यार से
सोचता हूँ तो है मुद्दआ कुछ नहीं

आईने की शिक़ायत भला क्यूँ मिंयाँ?
वह दिखाता है बस, देखता कुछ नहीं

फिर भी ग़ाफ़िल है रुस्वा हुआ इश्क़ में
जबके सब मानते हैं ख़ता कुछ नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 20, 2016

तू भी इल्ज़ाम लगाना तो ख़बर कर देना

जब तसव्वुर से हो जाना तो ख़बर कर देना
या के मुझको हो भुलाना तो ख़बर कर देना

देखकर नाज़ो अदा तेरी, है मुम्क़िन जो बहुत,
गर हो ग़ुस्ताख़ ज़माना तो ख़बर कर देना

वैसे इन्कार हमेशा मैं किया करता हूँ
पर अगर पीना पिलाना तो ख़बर कर देना

मुझको चोरी से मेरे दोस्त इत्तेफ़ाक़ नहीं
जी करे जी को चुराना तो ख़बर कर देना

नाम है फिर भी मगर, रक़्बा-ए-दिल पर मेरे
जब भी क़ब्ज़ा हो जमाना तो ख़बर कर देना

हो जो मालूम तो सज धज लूँ ज़रा मैं भी सनम
अब कोई रात हो आना तो ख़बर कर देना

जी तेरा जब भी भटक जाए रहे उल्फ़त में
और पाए न ठिकाना तो ख़बर कर देना

राज़ हो जाए कभी फ़ाश मिलन का अपने
तुझको सूझे न बहाना तो ख़बर कर देना

जी चुराने के मुक़दमें हैं कई ग़ाफ़िल पर
तू भी इल्ज़ाम लगाना तो ख़बर कर देना

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, नवंबर 19, 2016

ज़माने तेरी मिह्रबानी नहीं हूँ

शजर हूँ, तिही इत्रदानी नहीं हूँ
चमन का हूँ गुल मर्तबानी नहीं हूँ

ख़रा हूँ कभी भी मुझे आज़मा लो
उतर जाने वाला मैं पानी नहीं हूँ

ग़ज़ल हूँ, वही जो लबों पर है सबके
किताबों में खोई कहानी नहीं हूँ

मुझे याद रखना है आसान यूँ भी
हक़ीक़त हूँ झूठी बयानी नहीं हूँ

मैं ग़ाफ़िल भी हूँ तो हूँ करतब से अपने
ज़माने तेरी मिह्रबानी नहीं हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 16, 2016

किनारा था मैं बौराई नदी का

थे मेरे होंट आरिज़ था किसी का
दबी आवाज़ भी आई के ई का?

अभी आए हुए दो पल न बीते
भरोसा ख़ाक दूँ इक ज़िन्दगी का

है बाबत जिसके उस नाज़ुक जिगर को
बता दूँ क्या है ख़स्ता हाल जी का

गुनाहे यार भी क्या क्या गिनाऊँ
मैं शाइर हूँ मगर है शह उसी का

अचनाक मौत पर मेरे न ग़म कर
किनारा था मैं बौराई नदी का

कभी रुख़सार तो ला पास मेरे
मज़ा पा जाएगा तश्नालबी का

तेरे लिखने का मानी कुछ न ग़ाफ़िल
न हो पाए वो गर बाइस ख़ुशी का

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, नवंबर 11, 2016

वह राबिता भी क्या न जहाँ दिल्लगी रहे

क्या लुत्फ़ हो के तू जूँ उफनती नदी रहे,
डूबूँ मैं तुझमें, साथ मेरी तिश्नगी रहे

मौला करे लगे न किसी की नज़र कभी
ज़ीनत-ए-रू-ए-जाना हमेशा बनी रहे

यूँ भी न पेश आए के पूरा गँवा दूँ होश
लेकिन तू यह करे के ज़रा बेख़ुदी रहे

माना के दिल्लगी से ज़रर भी हुआ, मगर
वह राबिता भी क्या न जहाँ दिल्लगी रहे

क्यूँ बन सँवर के ख़ुद को सयाना दिखा रहा
ग़ाफ़िल रहा है और तू अब भी वही रहे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 03, 2016

शाइरी काफ़ी नहीं सूरत बदलने के लिए

मंज़िले उल्फ़त तो है अरमाँ पिघलने के लिए
है नहीं गर कुछ तो बस इक राह चलने के लिए

बन्द कर आँखें इसी उम्मीद में बैठा हूँ मैं
कोई तो जज़्बा मचल उट्ठे निकलने के लिए

हैं हज़ारों लोग तो सूरज पे ही इल्ज़ाम क्यूँ
ख़ाक करने को ज़हाँ आतिश उगलने के लिए

ये ज़ुरूरी है के हो उम्दा ख़यालों पर अमल
शाइरी काफ़ी नहीं सूरत बदलने के लिए

और कितनी लानतें ग़ाफ़िल पे भेजी जाएँगी
आतिशे उल्फ़त में उसके यार जलने के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 02, 2016

लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

क़शिश तो है इसमें है यह सिरफिरी, पर
लगी आज तुह्मत मेरी दोस्ती पर

ये मंज़र तस्सवुर में लाकर तो देखो
के हो चाँद तो, गुम सी हो चाँदनी, पर

लिया गर है जी आदमी आदमी का
लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

समझ में न आएँ गो अश्आर मेरे
तुझे तो यक़ीं हो के हैं क़ीमती, पर

ये क्या है के कहता है नफ़्रत है तुझसे,
मज़ा भी है आता तेरी बेतुकी पर

हर इक बज़्म में लोग अश्आर मुझसे
ही पढ़वा रहे आज तक आख़िरी पर

कहीं सोचकर यह के ग़ाफ़िल लिखा क्या
पटक दे न सर तू मेरी इस लिखी पर

-‘ग़ाफ़िल’