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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, October 25, 2017

ज़रा सा मुस्कुरा देते मेरा इन्आम हो जाता

तुम्हारा दर मेरे आना जो सुब्हो शाम हो जाता
क़सम अल्लाह की यह एक उम्दा काम हो जाता

नशीला हूँ सरापा गो मगर इक बार मुझको तुम
अगर नज़रों छू देते छलकता जाम हो जाता

नहीं उल्फ़त अदावत ही सही तुम कुछ तो कर लेते
तुम्हारे नाम से जुड़कर मेरा भी नाम हो जाता

मेरे पास आ गए होते अगर तुम मिस्ले चारागर
हरारत थी मुहब्बत की ज़रा आराम हो जाता

निगाहे लुत्फ़ मेरे सिम्त होता और तुम ग़ाफ़िल
ज़रा सा मुस्कुरा देते मेरा इन्आम हो जाता

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

  1. मेरे पास आ गए होते अगर तुम मिस्ले चारागर
    हरारत थी मुहब्बत की ज़रा आराम हो जाता
    ...बहुत खूब!

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