किए हैं वैसे तो रुस्वा हज़ार बार मुझे
समझ रहे हैं मगर दोस्त ग़मग़ुसार मुझे
बहुत यक़ीन है नज़रों पे तेरी जानेमन
कभी उधार की नज़रों से मत निहार मुझे
मिले न इश्क़ में थोड़ा भी है दुआ लेकिन
मिले अगर तो मिले दर्द बेशुमार मुझे
मुझे है इल्म के खाली है जेब या के भरी
ये ठीक है के तू समझे नसीबदार मुझे
भले न ख़ुश्बू हो खिलता है बारहा ग़ाफ़िल
नहीं है उज़्र तू कह तो सदाबहार मुझे

उम्दा ग़ज़ल।
ReplyDeleteआपकी ग़ज़ल में दर्द, आत्मसम्मान और सादगी का बहुत सुंदर मेल दिखाई देता है। हर शेर अपनी अलग पहचान रखता है और दिल तक सहजता से पहुँचता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!