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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, May 17, 2013

अब तो उनको आजमाना चाहिए

अब हमें भी हक़ जताना चाहिए।
अब तो उनको आजमाना चाहिए॥

कब तलक होकर जमाने के रहें,
अब हमें ख़ुद का जमाना चाहिए।

है दीवाना चश्म का ख़ुशफ़ह्म के
चश्म को भी अब दीवाना चाहिए।

दिल है नाज़ुक टूटता है बेखटक,
भीड़ में उसको बचाना चाहिए।

उनके आने का बहाना कुछ न था,
उनको जाने का बहाना चाहिए।

अब तो शायद हो चुकी पूरी ग़ज़ल,
यार ग़ाफ़िल! अब तो जाना चाहिए॥

हाँ नहीं तो!

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर ग़ज़ल ...हर शेर लाजवाब ...!!

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(18-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  3. वाह! बहुत सुंदर रचना
    क्या बात

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  4. वाह ! बहुत खूब!

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  5. देहक़ान बसा झोपड़ा महलो-मालो साह ।
    हक़ मिलै न हक्क़े-नाहक़ माँगे कौन पनाह ॥

    भावार्थ : -- किसान/गांववासी का झोपड़े में भी निर्वाह नहीं,
    और राजा राजसी जीवन व्यतीत कर रहा है । न अधिकार
    मिले, न ही न्याय मिले, अब वह किसकी शरण में जाए ॥

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार!

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  7. है दीवाना चश्म का ख़ुशफ़ह्म के
    चश्म को भी अब दीवाना चाहिए।...बेहतरीन लेकिन आपसे थोडा और समझना पड़ेगा इस शेर को..सादर

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  8. दिल है नाज़ुक टूटता है बेखटक,
    भीड़ में उसको बचाना चाहिए।

    wah sir behtreen gazal ke liye aabhar .

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