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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, October 01, 2013

विचरना अब चाहता है मेरा मन

क्या हुई तासीर तेरी छुअन की
अब नहीं झंकृत है होता तन-बदन
वह खुमारी सहसा अब छाती नहीं
नृत्य अब करता नहीं है मेरा मन

तू वही तो है? या कि ग़ाफ़िल हूँ मै?
प्रश्न यह पर्वत सा बनता जा रहा
ऐसे दोराहे पे आकर हूँ खड़ा
रास्ता कोई नहीं है भा रहा

है अनिश्चित अब मेरी भवितव्यता
अब तू अपने वास्ते कुछ कर जतन
सारे लोकाचार से उन्मुक्त हो
विचरना अब चाहता है मेरा मन

1 comment:

  1. तू वही तो है? या कि ग़ाफ़िल हूँ मै?
    प्रश्न यह पर्वत सा बनता जा रहा
    ऐसे दोराहे पे आकर हूँ खड़ा
    रास्ता कोई नहीं है भा रहा

    है अनिश्चित अब मेरी भवितव्यता
    अब तू अपने वास्ते कुछ कर जतन
    सारे लोकाचार से उन्मुक्त हो
    विचरना अब चाहता है मेरा मन
    आज सब कुछ पढ़ लेना चाहता हूँ आपका लिखा ! एक एक रचना , एक एक ग़ज़ल ! सुन्दर

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